Thursday, March 29, 2012

ओस और आंसू का अस्तित्व गिरने में ही है

"ओस और आंसू का अस्तित्व गिरने में ही है,
उठो तुम खौलते पानी से जैसे भाप उठती है.
बता दो आसमां को अश्क का उपहास मत कर ,
नज़र नीचे करो और देख लो
दहकता है जो दिल में वो जज्वा है,
ज्वालमुखी से जैसे आग उठती है.
"---- राजीव चतुर्वेदी

3 comments:

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) said...

बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति!

प्रवीण पाण्डेय said...

पर आँसू काँधे पर गिरे, ओस पत्तों पर गिरे।

suman.renu said...

shabdon ki bhoomikaa ka jabaab nahee