Friday, June 22, 2012

इस दौर में हर रोशनी बिकती है

"मैं जानता हूँ इन उदास रातों का उल्लेख अखबारों में नहीं होगा
शब्द चीखेंगे नहीं सुबकेंगे तो
सुबह फिर से ढाढस बंधाती दौड़ आयेगी
जिन्दगी का ठहरा पहिया चरमरा कर चल पड़ेगा
तुम मिलोगे राह में फिरसे गुज़रते वक्त से
निरंतर बढ़ रही इन दूरियों के दरमियाँ मैं देखूंगा तुम्हें मुड मुड़ के
खो रही इस जिन्दगी के सो रहे सपने जगाता
बिक चुका हूँ मैं
जो नहीं बिक पाया इस दुकाँ से उस मकां तक वह तुम्हारा शेषफल हूँ
तारीकियाँ तश्दीक करती हैं कि
चुका पाए नहीं हो तुम गुज़रे माह का बिजली का बिल
और यह भी कि इस दौर में हर रोशनी बिकती है." ----राजीव चतुर्वेदी    

3 comments:

प्रवीण पाण्डेय said...

सच है..

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) said...

बहुत सुन्दर प्रस्तुति!
आपको सूचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि-
आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा कल रविवार (24-062012) को चर्चा मंच पर भी होगी!
सूचनार्थ!

Anju (Anu) Chaudhary said...

बहुत सही कहा ...हर दौर में ...सच्चाई बिकती हैं ...