Thursday, May 3, 2012

दृष्टिकोणों के किवाड़ों पर जो सांकल थी यहाँ सिद्धांत की



"जुगनुओं को रोशनी की जब जरूरत थी यहाँ, ---तुम नहीं थे,
दृष्टिकोणों के किवाड़ों पर जो सांकल थी यहाँ सिद्धांत की
उसकी आहट
बौखलाहट
सन्नाटा सृजन का टूटता तो टूटता कैसे ?
शब्द शामिल थे कलह की कूटरचना में
कल्पनाएँ कालबाधित सी कलम से हर कलामों तक क़त्ल होती यहाँ थीं
आहत आस्था की आह को कुछ कह उठे कविता
इस सहमते सत्य के संकेत पढ़ कर जो घुमड़ता था कभी मेरे भी सीने में
अगर पहुंचा नहीं है आज तक तेरे दिलों तक वह
तो समझलो सत्य का साहित्य लिखने की यह कोशिशें कविता नहीं हैं
वास्तविक कविता के कठिन से दौर को जब दर्ज करके आँख मेरी बुझ रही होगी
तुम्हारी आँख भी यह जान कर कुछ नम तो होगी
जुगनुओं को रोशनी की जब जरूरत थी यहाँ ---तुम नहीं थे,
दृष्टिकोणों के किवाड़ों पर जो सांकल थी यहाँ सिद्धांत की
उसकी आहट
बौखलाहट
सन्नाटा सृजन का टूटता तो टूटता कैसे ?" ----राजीव चतुर्वेदी (4May'12)

2 comments:

वन्दना said...

बेहद गहन अभिव्यक्ति

anjana said...

बेहद सुन्दर कविता