Thursday, May 16, 2013

हिन्दी - दोहरी निष्ठा लेकर प्रतिष्ठा की लड़ाई नहीं लड़ी जा सकती

"दोहरी निष्ठा लेकर प्रतिष्ठा की लड़ाई नहीं लड़ी जा सकती ...प्रतिष्ठा के लिए एकनिष्ठ होना पड़ता है . भारतीय भाषाओं और समाज के साथ यही विडंबना है . भारत में रहने वाले यहाँ तक की जिनका जिनके पुरखों का भी जन्म यहीं हुआ उनके तीर्थ, उनकी आस्था और निष्ठा अरब देशों में बसती है ...पाकिस्तान में बसती है पर भारत में नहीं उनकी दोहरी निष्ठाएं हैं इसी लिए अरब देशों में यह दोयम दर्जे के नागरिक हैं ,पाकिस्तान में मुहाजिर हैं और भारत में संदेहास्पद।
जिन महिलाओं की शादी के बाद दोहरी निष्ठा होती है वह मायके और ससुराल के बीच त्रिशंकु सी टंगी रहती हैं और उनके परिवार टूट ही जाते हैं ...दोनों ही जगह वह संदेहास्पद होती हैं।
हिन्दी भाषा को भी दोहरी निष्ठा से ख़तरा है ...हिन्दी अंग्रेजी से नहीं पराजित है हिन्दी अपने गर्भ से जन्मी उन भाषाओं के कारण टूट रही है जिनकी वर्तनी और लिपि देवनागरी है ....हिन्दी भाषी समाज में दोहरी निष्ठा हिन्दी के लिए वैसे ही घातक है जैसे देश में रह रहे मुसलमानों की दोहरी निष्ठा या विवाहित स्त्री की दोहरी निष्ठा। हिन्दी की कोख से जन्मी वह भाषाएँ जिनकी लिपि और वर्तनी देवनागरी है हिन्दी भाषी समाज को एकनिष्ठ नहीं होने दे रही और  दोहरी निष्ठा लेकर प्रतिष्ठा की लड़ाई नहीं लड़ी जा सकती ...हिन्दी भाषी समाज की दोहरी निष्ठा हैं ...भोजपुरी समाज अलग है ...कुमायूनी अलग ...गढ़वाली अलग ...बृजभाषी अलग हैं ..अवधी अलग ...बुन्देलखंडी अलग ...  रूहेलखंडी अलग ...हम विखंडन की प्रवृत्तियों के खण्डित निष्ठा वाले लोगों को साथ ले कर भला अखण्ड भारत अखण्ड समाज की कल्पना भला कैसे कर सकते हैं ? निष्ठा के प्रश्न पर खण्डित लोगों को ले कर अखंडता का पाखण्ड ? ....हिन्दी को आज सबसे बड़ा ख़तरा हिन्दी के बहिरुत्त्पाद जैसी विकसित हुयी भोजपुरी, कुमायूनी, गढ़वाली, बृजभाषा, बुन्देलखंडी,रुहेलखंडी, अवधी भाषाओं और इन भाषाओं के प्रति निष्ठा रखने वाले समाज से है  ...निजी प्रतिष्ठा के लिए ...भारत की प्रतिष्ठा के लिए ...हिन्दी की प्रतिष्ठा के लिए हमें एकनिष्ठ होना ही पडेगा ...दोहरी निष्ठा किसी एक के साथ छल है ...दोहरी निष्ठा लेकर प्रतिष्ठा की लड़ाई नहीं लड़ी जा सकती .
" -----राजीव चतुर्वेदी


2 comments:

प्रवीण पाण्डेय said...

अपने सशक्त सूत्र खोजने होंगे भारतीय भाषाओं को, वे हैं संस्कृत में, न कि अंग्रेजी में।

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) said...

बहुत सही...!