Friday, September 27, 2013

आओ कुछ ख्वाब खरीदें उसी मण्डी से

" आओ कुछ ख्वाब खरीदें उसी मण्डी से
जहाँ हम बिक रहे हैं रोज टुकड़ों में
कहो, कैसा लगा यह सत्य सुन कर ?
शाम का सूरज अस्त होता है पराजित सा
रात को जब चांदनी चर्चा करेगी
तो उसमें तुम्हारी वेदना भी गुमशुदा होगी
ये रंगीन रातें उनकी हैं और ग़मगीन सुबह तुम्हारी है
सुना है ये धरती घूमती है
तो धरती के सभी सिद्धांत भी तो घूमते होंगे
इस घूमते भूगोल के अक्षांश से पूछो
हमारी वेदना की व्याख्या
जिन्दगी की भूमध्य रेखा से
और कितनी दूर तक फ़ैली हुयी है 
और हर देशांतर का टापू एक मण्डी सा सजा है
देह से ले कर वहाँ पर स्नेह बिकता है --- खरीदोगे ?
चले आओ
आओ कुछ ख्वाब खरीदें उसी मण्डी से
जहाँ हम बिक रहे हैं रोज टुकड़ों में
कहो, कैसा लगा यह सत्य सुन कर ?"
  ---- राजीव चतुर्वेदी

4 comments:

प्रवीण पाण्डेय said...

कहाँ मिलेगा प्रेम बताओ,
कितना भी हो, खर्च करेंगे।

Saras said...

डरावना ...और सोचने पर मजबूर करता हुआ...क्या वाकई...!!!!..

कालीपद प्रसाद said...

सचाई से रुबरु करती रचना
नई पोस्ट अनुभूति : नई रौशनी !
नई पोस्ट साधू या शैतान

राजीव कुमार झा said...

बहुत सुन्दर .
नई पोस्ट : भारतीय संस्कृति और कमल