Saturday, July 6, 2013

निर्जन में जब सृजन ज़रा सा विचलित होगा ...मेरे टुकड़े खनक उठेंगे

" इसके पहले कि मैं बटोर पाता अपने को
वह मेरे कुछ टुकड़े उठा कर चल दिया
मैंने अपने बिखराव को जोड़ा बहुत
पर मुकम्मल होता तो होता कैसे ?
दुखड़े मेरे पास पड़े थे
टुकड़े उसके पास पड़े थे
वह थोड़ा मेरे पास पड़ा था
मैं भी उसके पास पड़ा था थोड़ा सा
खंडित व्यक्तित्वों के दम्भ पहाड़ों पर पत्थर से लुडक रहे हैं
सिद्धों के सिद्धांत देख कर
गिद्धों से तितली ने पूछा

मुझको फूल जहाँ पर दिखते तुमको लाशें क्यों दिखती हैं ?
दृष्टिकोण का क्षितिज जहाँ हो
आसमान धरती पर आ कर टिक जाता है
और वहाँ तक मैं बिखरा हूँ
देवदार का प्रश्न यही है दावानल से
मेरे टुकड़े मत लौटाओ
ब्रम्हलीन होने का मतलब जान चुका हूँ
दूर क्षितिज पर लक्ष समझता था मैं जिसको
आज वहाँ पर यक्ष खड़ा है
और मरीचिका टुकड़े मेरे कैनवास पर सजा रही है
निर्जन में जब सृजन ज़रा सा विचलित होगा
मेरे टुकड़े खनक उठेंगे .
" ----- राजीव चतुर्वेदी

2 comments:

प्रवीण पाण्डेय said...

बहुत रचनात्मक सृजन, बिखरे टुकड़े जुड़ जाना चाहते हैं।

Gaddar Shayar said...

अत्यंत प्रभावी