Monday, February 25, 2013

तुम उसे कविता क्यों समझ बैठे


"मेरे जज़बात मेरे जख्मों से वाबस्ता थे ,
मैं कराहा था तुम उसे कविता क्यों समझ बैठे ."

             ---राजीव चतुर्वेदी

3 comments:

प्रवीण पाण्डेय said...

गहरी..संवेदनात्मक..

दिनेश पारीक said...

बहुत उम्दा
मेरी नई रचना

मेरे अपने

खुशबू
प्रेमविरह

vandana said...

मात्र दो पंक्तियों में बहुत कुछ कह दिया आपने