Tuesday, August 28, 2012

बिखरे सपनो की किरचें घायल करती हैं

"बिखरे सपनो की किरचें घायल करती हैं,
शब्द खड़े हैं रस्तों में अब शातिर से
सहमा सा छाता अब व्याख्या करता है हर बादल की
पगडंडी के पाखंडी सच से गुजर रहे ग़मगीन समाजों के सच को भी देखो
तो बात करो बरसातों की
उसमें आंसू की बूँद तुम्हारी भी होगी." ----राजीव चतुर्वेदी

Friday, August 24, 2012

हम दरअसल अमेरिका के गुलाम हैं



"अगर यह लड़ाई लोकतंत्र की होती तो अच्छा था...अगर यह लड़ाई जनादेश की होती तो अच्छा था ...अगर यह लड़ाई कोंग्रेस -भाजपा--सपा-वाम--NDA-UPA की होती तब भी अच्छा था...यह लड़ाई हिन्दू -मुसलमान की भी नहीं है. यह लड़ाई तो KGB Vs. CIA है जिसमें जनादेश या हम भारतीय नागरिकों की इच्छा बेमानी है. हमारा प्रधानमंत्री चुनाव जीत कर नहीं आता बल्कि "मेड बाई अमेरिका" आता है. हमारे क़ानून "मेड बाई अमेरिका" आते हैं. हमारा राष्ट्रपति "मेड बाई अमेरिका" होता है. सोनियां इलाज करवाने जाती हैं तो अमेरिका. यह अमरीकी गुर्गे भारत की राजनीति में सेंध फोड़ कर घुस आये हैं चुनाव जीत कर हमारा जनादेश ले कर नहीं आये. एशिया में सोवियत रूस के वर्चस्व को मात देने के लिए अमेरिका ने ओसामा बिन लादेन को गोट बनाया था और भारत को मात देने के लिए मन मोहन सिंह को गोट बनाया है. मन मोहन सिंह भारतीय राजनीति के टेस्ट ट्यूब बेबी होते तो स्वीकार कर लिए जाते...वह भारतीय राजनीतिक पालने मैं पल रही लोकतंत्र की नाजायज संतान हैं. यह अमरीकी वायरस भारतीय राजनीति में जब से घुसे है भारत की राजनीति वायरल फीबर से ग्रस्त है. चूंकि मन मोहन सिंह जनता से सीधे चुन कर तो आये नहीं हैं इस लिए जनता के प्रति जवाबदेह भी नहीं हैं वह अमेरिका के द्वारा भारत पर थोपे गए हैं इस लिए अमेरिका के प्रति जवाब देह हैं और आज की तारीख में हम दरअसल अमेरिका के गुलाम हैं." ----राजीव चतुर्वेदी

गैलीलियो और गुलेलों के बीच



"गैलीलियो और गुलेलों के बीच सभ्यता के शिलान्यासों को भी देख,
आसमानों और धरती के बीच असमान से अहसासों को भी देख
एक सूरज सहम कर शाम को बिजली के खम्बे में लटक कर आत्महत्या कर चुका है
दूसरी सभ्यता ऐसी है कि उसकी रात ही गुलजार होती है
एक अभागन माँ,   बेटी की विवशता जानती है और रो-रो के सोती है
जानती है सुबह तक बेटी लौटेगी अपनी देह के अनुपात में कुछ दाम लेकर चेहरा दामन से लपेटे
चांदनी के चरित्रों का चर्चा सुन के सूरज सिहर जाएगा
एक सूरज सहम कर शाम को बिजली के खम्बे में लटक कर आत्महत्या कर चुका होगा आसमानों और धरती के बीच असमान से अहसासों को भी देख  
गैलीलियो और गुलेलों के बीच सभ्यता के शिलान्यासों को भी देख."  ----- राजीव चतुर्वेदी 



Tuesday, August 21, 2012

ज़रा हाथ दिखाओ, --- कहीं खंजर तो नहीं ?

"तेरी मुस्कराहट मेरी नज़रों का धोखा भी तो हो सकती है,
ज़रा हाथ दिखाओ, --- कहीं खंजर तो नहीं ?
हर बार किसी घर से निकाला है मेरे अपनों ने,
सोचता हूँ बारहा फिर वही मंजर तो नहीं ?
मैंने तो रिश्ते के पौधे भी लगाए थे यही सोच कर
इन दरख्तों के साए में कुछ अपने भी यहाँ बैठेंगे
प्यार के पौधे दरख़्त बनने से पहले ही यहाँ सूख गए ,
हौसले अब हाँफते हैं, सोचता हूँ, ---कहीं तेरे जहन की जमीन ही बंजर तो नहीं ? "
----राजीव चतुर्वेदी 

Sunday, August 19, 2012

ईद को कैसे कहूं मैं अब मुबारक ?



"ईद को कैसे कहूं मैं अब मुबारक ?
खून जो फैला है सड़क पर वह भी तो मेरा ही है
जिस वतन में हो रहा है यह रमजान की रस्मों की तरह
उस देश का गुनाह है यह महज़
कि हज़रत मुहम्मद महफूज थे इस देश में उस दौर में जब यजीदी कारवाँ कोहराम करता था 

फातिमा के आंसुओं में अक्स है इंसानियत का
सूफियानो की यहाँ औलाद सुन लें और सोचें
कातिलों की यह कतारें कर रही अब अलविदा हैं
अलविदा नावाजों को...मुहम्मद के नवासों को ...अमन की हर रिवाजों को
और यह भी तो बताओ तुम हमें
होली और दीपावली की बधाई तुम कभी भी क्यों नहीं देते ?
और जब हमने आदाब कह कर अदब तुमको दिया
"जय राम जी की"... तुम्हारी जुबान से भी क्यों नहीं फूटा ?
यह माना कि तुम बन्दे हो खुदा के पर कभी बन्दे मातरम क्यों नहीं कहते ?
खौफ खाओ खुदा का, सूफियानो के न तुम वारिस बनो
जो मरे हैं माँ तो उनकी फातिमा भी है
जिन्दगी की इस कर्बला में तुम किधर हो ?
सूफियों के इस वतन में सूफियानो के सिपाही या यजीदी काफिले यह ?
ईद की कैसे कहूं मैं अब मुबारक ?
ईद की किसको कहूं मैं अब मुबारक ?
फातिमा मेरी थी तो सीता उसके पहले तेरी थी यह याद रख
इस धरा पर "गोधरा" तैने किया कह दे याजीदों से
तेरे पुरखे यहीं इस देश के ही थे, यहाँ के ख्वाब तेरे हैं, यहाँ की ख़ाक तेरी है
तू चूम ले इस देश की धरती को,--- यही है फ़र्ज़ अब तेरा
तुम कहो एक बार बन्दे मातरम मैं कहूंगा ईद तुमको हो मुबारक !!
" -----राजीव चतुर्वेदी

Friday, August 17, 2012

न्यायिक दृष्टिकोण का यह खतना तो खलिश पैदा कर रहा है


"पाकिस्तान में औसतन प्रति दिन ४० मुसलमान इस्लामिक आतंकवाद की घटनाओं में मारे जाते हैं पर इससे मुसलमान आंदोलित नहीं होते. अफगानिस्तान में औसतन प्रतिदिन २८ मुसलमान इस्लामिक आतंकवाद में मारे जाते हैं इस पर मुसलमान नहीं भड़कते. भारत में हुई आतंकवाद की घटनाओं पर कभी कोई किसी भी प्रकार का मुसलमान खेद व्यक्त करता हो या आतंकवाद की घटना की निंदा करता हो तो बताओ ? लेकिन गुजरे साल म्यांमार में 4 बलात्कार कर रहे लड़कों के रंगेहाथ पकडे जाने और जनता द्वारा पिटाई के बाद भारत में इस लिए हिंसा भड़क जाती है क्योंकि वह बलात्कारी मुसलमान थे और मुम्बई, लखनऊ, कानपुर,इलाहाबाद में हिंसा और तोड़ फोड़ होती है. मुजफ्फरनगर में भी लडकी की इज्जत पर हाथ डालने पर जब एक आवारा लड़के को उत्पीडित लडकी के भाई मारते हैं तो हिंसा इस लिए भड़क जाती है क्योंकि बलात्कार की कोशिश कर रहा वह आवारा युवक मुसलमान था और उत्तर प्रदेश में व्यापक दंगे होते हैं।   कुल मिला कर बात यह कि मुसलमान आतंकवादी या दंगाई जब तक किसी दूसरे को मारते हैं तब तक शातिराना चुप्पी है और जब मारे जाते हैं तो छाती पीटी जाती है. भारत में इस्लामिक आतंकवाद  से प्रति वर्ष इतने लोग मरते हैं कि जितने किसी भी युद्ध में नहीं मरे पर उसकी निंदा करता या सांत्वना देता कोई बयान कहीं नहीं सुनाई पड़ता,--- तब कहाँ चले जाते हैं मुल्क के तरक्की पसंद, अमन पसंद मुसलमान ? है कोई अमन पसंद मुसलमान ? है कोई राष्ट्र प्रेमी मुसलमान ? ---तो बोलते क्यों नहीं ? अगर ऐसे में भी अमन पसंद मुसलमानों की चुप्पी रही तो मुल्क तो यह मान ही लेगा कि मुसलमान केवल साम्प्रदायिक ही नहीं हैं बल्कि दहशतगर्द दंगाईयों के साथ हैं और भारत राष्ट्र को तोड़ने की साजिश में मूक या मुखर हो कर शामिल हैं. कश्मीर के विस्थापित पंडितों के लिए कभी किसी मुसलमान ने आवाज़ उठाई हो तो बताओ ? औरंगजेब के द्वारा हिन्दू मूर्ति / मंदिर तोड़ना जायज था, लखनऊ में अलविदा की नवाज़ के बाद बुद्धा पार्क में भगवान् बुद्ध की और महावीर भगवान् की मूर्ति तोड़ना जायज है, बामियान में तालिबान द्वारा बुध प्रतिमाएं तोड़ना जायज है तो फिर बाबरी मस्जिद तोड़ा जाना क्यों नाजायज है ?  जम्मू -कश्मीर में इस्लामिक आतंकवादीयों ने दर्जनों मंदिर जला डाले कहीं से किसी मुसलमान के मुंह से साम्प्रदायिक सौहार्द के स्वर नहीं फूटे,--क्यों ? लेकिन बाबरी मस्जिद के लिए श्यापा आज तक जारी है जबकि उसी दौर में हजरत मुहम्मद साहब की बनवाई हुई मस्जिद चरार -ए-शरीफ को इस्लामिक आतंकवादी मस्तगुल ने जला कर राख कर दिया तो कोई बात नहीं. कुल मिला कर अगर मामला इस्लामिक आतंकवाद का है तो मुसलमान उसकी मुखर या मूक पक्षधरता करते हैं और जब कहीं मारे जाते हैं तो श्यापा करते हैं. माना कि शारीरिक खतना मुसलमानों की साम्प्रदायिक शिनाख्त है पर न्यायिक दृष्टिकोण का यह खतना तो खलिश पैदा कर रहा है."---- राजीव चतुर्वेदी 




Sunday, August 12, 2012

यह षड्यंत्र है लोकतंत्र नहीं


"15 अगस्त'1947 से 15 अगस्त 2014  के बीच के सफ़र में हम कहाँ हैं ? भारत बनाम इंडिया की खाई और गहरी हुई है इस कृषि प्रधान देश को चलाता है 70 % ग्रामीण भारत और उस पर ऐश करता है 30% शहरी भारत. सरदार मनमोहन सिंह के कार्यकाल में जो भारत की अर्थ व्यवस्था की अर्थी ही निकल गयी है. अब बजट में सुविधाओं का बटवारा भी अमीर और गरीब के लिए अलग अलग है अब अमीरों को Consumer Index यानी "उपभोक्ता सूचकांक" के आधार पर सुविधाएं दी जा रही हैं और गरीबों को Gross Domestic Product यानी कि "सकल घरेलू उत्पाद" के हिसाब से. बात साफ़ है कि अमीर को उसकी उपभोग करने की क्षमता के हिसाब से सरकार सुविधा देगी और गरीब को सुविधाएं दिए जाने से पहले यह पूछा जाएगा कि तुमने क्या उत्पादन किया है या तुम्हारी कमाई कितनी है ? ... या तुम्हारी तो औकात क्या है ? परिणाम सामने है दवा मंहगी और दारू सस्ती हो रही है. रोडवेज बस का किराया बढ़ रहा है, हवाई जहाज का किराया घट रहा है. खेतों में अन्न उगाना अलाभकारी धंधा है खेतों की प्लोटिंग करना बहुत लाभकारी है. देश में सभी वस्तुओ के दाम आसमान पर पहुँच गए बस कृषि उत्पादन के दाम नहीं बढ़ रहे क्यों ? फसल जब तक किसान के यहाँ रहती है सस्ती होती है और जैसे ही आढतियों के यहाँ पहुँच जाती है मंहगी हो जाती है.
             देश की सीमा की रक्षा करता है गाँव का बेटा....देश और प्रदेश की सरकारें बनती हैं गाँव के वोट से...देश का पेट भरता है गाँव के कृषि उत्पाद से...शहर के लोग गाँव के लोगों से अधिक प्रति व्यक्ति दूध/ दही /घी /सब्जी का उपभोग करते है. शहर के मिल का मालिक होता है शहर का आदमी और मजदूर होता है गाँव का आदमी. शहर में साहब होता है शहर का आदमी यानी "इंडिया" और नौकर होता है गाँव का आदमी यानी "भारत". आज भी शहर के अभिजात्य पब्लिक स्कूलों और गाँव के टाट पट्टी वाले स्कूलों के बीच सामान शिक्षा का नारा मुह बाए खड़ा है. अर्जुन और एकलव्यों के स्कूल आज भी अलग-अलग हैं. पब्लिक स्कूलों के पढ़े लोगों के लिए गाँव से गुलाम ढालने के लिए गाँव के स्कूल चलाये जा रहे हैं.----यह षड्यंत्र है लोकतंत्र नहीं."------राजीव चतुर्वेदी