Monday, April 30, 2012
आफताब की आफत आ गयी यार !!
"आफताब की आफत आ गयी यार !!
जेनरेटर की मार्केटिंग में लालटेन यह कहती है
सुन कर व्यवहार का सच बाजार के सच पर तरस खाता है
शब्दकोशों में कैद सच को रिहा करो यारो
पूछ लो अब तितलियों से तथ्य फूलों का
सतह पर जो फतह कर लौटता है ज्ञान के गूलर का भुनगा
कोलंबस की भूल सभी पर भारी है क्यों ?
सत्य तथ्य से उपजेंगे जब सार्वभौमिक होकर समाचार का सूत्र बनेगे
षड्यंत्रों से जब तुम उनको बुन डालोगे
तो विचार के अवशेषों पर खडी प्रचार की प्राचीरें होंगी
और वहां फिर कंदीलों को सूरज कोई कह डालेगा
सच की महक नहीं बदली है मानक मत बदलो तुम." ----- राजीव चतुर्वेदी
जेनरेटर की मार्केटिंग में लालटेन यह कहती है
सुन कर व्यवहार का सच बाजार के सच पर तरस खाता है
शब्दकोशों में कैद सच को रिहा करो यारो
पूछ लो अब तितलियों से तथ्य फूलों का
सतह पर जो फतह कर लौटता है ज्ञान के गूलर का भुनगा
कोलंबस की भूल सभी पर भारी है क्यों ?
सत्य तथ्य से उपजेंगे जब सार्वभौमिक होकर समाचार का सूत्र बनेगे
षड्यंत्रों से जब तुम उनको बुन डालोगे
तो विचार के अवशेषों पर खडी प्रचार की प्राचीरें होंगी
और वहां फिर कंदीलों को सूरज कोई कह डालेगा
सच की महक नहीं बदली है मानक मत बदलो तुम." ----- राजीव चतुर्वेदी
Sunday, April 29, 2012
अपने मुस्तकबिल के बावत सोचने दो अब मुझे
"अपने मुस्तकबिल के बावत सोचने दो अब मुझे ,
गुजरती शाम का सूरज मुडेरों पर खडा है.
वहां जिस डाल पर एक चिड़िया का घोंसला है ,
वहां तक एक अजगर जा चढ़ा है .
इबादत और अब मैं क्यों करूं तेरी,
तू उतनी दूर ही मुझसे अब भी खडा है .
ये कहते हैं कि पूरी रात रोया है रहमगर भी,
यजीदी काफिले का रुख अब फिर से मुड़ा है." -- राजीव चतुर्वेदी
( मुस्तकबिल = भविष्य , इबादत = अर्चना/ पूजा , रहमगर = दयानिधान / भगवान् / अल्लाह ,
यजीदी काफिला = कर्बला में यजीद के काफिले ने ही मुहम्मद साहब के वंश नाश का प्रयास किया था./ कातिल खलनायक की सेना.)
गुजरती शाम का सूरज मुडेरों पर खडा है.
वहां जिस डाल पर एक चिड़िया का घोंसला है ,
वहां तक एक अजगर जा चढ़ा है .
इबादत और अब मैं क्यों करूं तेरी,
तू उतनी दूर ही मुझसे अब भी खडा है .
ये कहते हैं कि पूरी रात रोया है रहमगर भी,
यजीदी काफिले का रुख अब फिर से मुड़ा है." -- राजीव चतुर्वेदी
( मुस्तकबिल = भविष्य , इबादत = अर्चना/ पूजा , रहमगर = दयानिधान / भगवान् / अल्लाह ,
यजीदी काफिला = कर्बला में यजीद के काफिले ने ही मुहम्मद साहब के वंश नाश का प्रयास किया था./ कातिल खलनायक की सेना.)
Saturday, April 28, 2012
स्वतंत्रताके महास्वप्न का मध्यांतर है यह
"स्वतंत्रताके महास्वप्न का मध्यांतर है यह. एक-एक कर व्यवस्था के खम्बे गिर रहे हैं. वह विधायिका बाँझ है जो आज तक देश को देसी क़ानून भी न दे सकी. न्यायपालिका नपुंसक तो थी ही बेईमान भी है. उच्च न्यायालयों के जज कैसे बनते थे यह अभी तक अन्दर की बात थी पर अभिषेक मनु सिंघवी की सीडी के बाद सभी को पता चल गया है उच्च न्यायालयों के जजों का विस्तार विस्तर के जुगाड़ से होता है.सिघवी के पहले एक महेश्वरी जी भी उच्च न्यायालय के दर्जनों जज बिस्तरों के विस्तार और देह दर्शन पर बना चुके हैं. कार्यपालिका यानी नौकरशाहीकर्महीन (कमीन) है यह सभी जानते है.... कहाँ रोयें ? मीडिया में ? मीडिया अब...मंडी बन चुकी है.उठो नया सृजन करो ! यह देश इन घोटालेबाजों के बाप का नहीं आप का भी है.शब्द युद्ध करो, शस्त्र युद्ध करो !!" ----राजीव चतुर्वेदी
वरना अफ़सोस के अफ़साने सुने हैं मैंने भी बहुत
"तू मेरी तकदीर की तश्वीर होती तो बेहतर होता
वरना अफ़सोस के अफ़साने सुने हैं मैंने भी बहुत ." --- राजीव चतुर्वेदी
वरना अफ़सोस के अफ़साने सुने हैं मैंने भी बहुत ." --- राजीव चतुर्वेदी
दर्ज होना चाहती हैं खूबसूरत सी खरासें
"सहमती शाम का सूरज संकोची सा नज़र आया
रात में दहशत अँधेरा ओढ़ कर बैठी रही
शब्द लाशें बन के सुबह बिखरे थे अखबार में
दिन के सूरज की उंगली पकड़ कर मैं निकला था घर से
शाम होते मैं कहीं गुम हो गया था
जिन्दगी की इस तश्वीर को तहरीर मत समझो
आज मेरे खून से तर दिख रहे हैं उन्हीं काँटों पर
दर्ज होना चाहती हैं खूबसूरत सी खरासें." -----राजीव चतुर्वेदी
रात में दहशत अँधेरा ओढ़ कर बैठी रही
शब्द लाशें बन के सुबह बिखरे थे अखबार में
दिन के सूरज की उंगली पकड़ कर मैं निकला था घर से
शाम होते मैं कहीं गुम हो गया था
जिन्दगी की इस तश्वीर को तहरीर मत समझो
आज मेरे खून से तर दिख रहे हैं उन्हीं काँटों पर
दर्ज होना चाहती हैं खूबसूरत सी खरासें." -----राजीव चतुर्वेदी
Subscribe to:
Posts (Atom)




