Saturday, December 8, 2012

वह कसमों सा आया और रस्मों सा चला गया

"वह कसमों सा आया और रस्मों सा चला गया ,
मैं पेड़ों सी खडी रही
वह हवा सा गुज़र गया
हिला गया बदन मेरा
खिला गया वह मन मेरा
वह गुज़र गया तो पता चला
मुझे गुजारिशों पे गुरूर था .
" ---- राजीव चतुर्वेदी

Wednesday, December 5, 2012

साम्प्रदायिकता को कानी आँख से देखने की कवायद न करें




"आज़म खान साहब कहते हैं कि --- "(दादरी के मृतक ) अखलाक़ की हत्या बाबरी मस्जिद की शहादत सी है । ये भी कहा है कि न बाबरी भूले हैं और न अखलाक़ को भूलेंगे ।" भूले तो हम भी नहीं हैं आज़म खान साहब कि तुमने कभी भारत माता को डायन कहा था … कि तुम  मंत्री की शपथ लेने में भारत की अखण्डता शपथ नहीं ली थी और राजयपाल ने तुमको दुबारा शपथ दिलवाई थी … भूले तो हम भी नहीं हैं कि आज तुम संयुक्त राष्ट्र में श्यापा करने की धमकी दे रहे हो पर जम्मू -कश्मीर के विस्थापित हिन्दुओं की और हिन्दुओं के मुसलमानो द्वारा सामूहिक नरसंहार की तुमको सुध नहीं आयी ? … मत भूलो आज़म खान कि अल्पसंख्यक कहलाने वाले मुसलामानों द्वारा मारे गए हिन्दू मृतकों की संख्या बहुसंख्यक है।

हिन्दू और मुसलमान भारत में यह दो अलग-अलग राष्ट्र विकसित हो रहे हैं --- यह खतरनाक है . पाकिस्तान के इशारे पर प्रथकतावादी यही चाहते हैं . 30 जुलाई '15 की सुबह यह नज़ारा नजीर बन गया कि जब एक तरफ पूर्व राष्ट्रपति अब्दुल कलाम देश के एक कोने में सुपुर्द -ऐ-ख़ाक हो रहे थे और देश के दुसरे कोने में मुम्बई बम ब्लास्ट का आरोपी याकूब मेमन का फांसी के बाद शव दफनाया जा रहा था … किसी आज़म खां ,ओबीसी ,जीलानी, मुल्ला मौलवी या शाही इमाम बुखारी ने अब्दुल कलाम को आख़िरी सलाम किया हो तो बताओ … अब्दुल कलाम के निधन पर बहुसंख्यक हिन्दू बहुसंख्या में शोक मनाते देखे गए और अल्पसंख्यक मुसलमान अल्पसंख्या में जबकि एक जघन्य अपराधी याकूब मेमन की पुरजोर पैरोकारी  के बाद हुई फांसी के बाद मिले शव को दफनाने ले जाते लोगों की भीड़ मुसलमान और केवल मुसलमानो की ही थी। … दो अलग अलग चरित्रों में बनता राष्ट्र साफ़ देखा जा सकता था… देशप्रेमी मुसलमान (कलाम )के लिए मुसलमानों की तरफ से श्रद्धांजलि का भी टोटा था जबकि देशद्रोही (याकूब मेमन ) के लिए मुसलमान  देशद्रोही अरमान सड़क पर प्रकट हो रहा था। शास्त्रार्थ की संस्कृति शस्त्रार्थ वालों को न अब तक समझ में आयी थी न वह समझने को तैयार ही थे। … वह कभी खान अब्दुल गफार खान ( जिन्हे देश प्यार और आदर से सीमान्त गांधी कहता था ) के पीछे नहीं चले … रफ़ी अहमद किदवई के पीछे नहीं चले  … वह अबुल कलाम आज़ाद के भी कभी अनुयायी नहीं रहे क्योंकि उनका नायक देशप्रेमी मुसलमान नहीं हो सकता था …  हमेशा किसी न किसी देशद्रोही अपराधी नालायक़ में नायक तलाशते थे और कभी हाजी कुली मिर्ज़ा मस्तान के पीछे लगे … कभी दाऊद के … उनके लिए हर गुंडा "भाई जान" और हर रण्डी "उमराव जान" थी।   एक समय था जब सुबह रेडिओ पर मुहम्मद रफ़ी का गाया --"...मन तडपत हरि दर्शन को ..." गूंजता था तो लता गाती थीं --"...अल्लाह तेरो नाम ...दाता तेरो नाम ..." यह भी हो सकता है कि यह उनकी व्यावसायिक विवशता रही हो . 

आज दोनों तरफ की साम्प्रदायिकता सत्य और न्याय को कानी आँख से देख रही है ---ज़रा गौर करें ---बाबरी मस्जिद की शहादत पर हर साल छाती पीटने वाले मुसलमान यह तो मानते हैं कि बाबरी मस्जिद का तोड़ा जाना गलत था पर क्या यह बताएँगे कि जब औरंगजेब के जमाने से जब हिन्दुओं के मंदिर तोड़े जा रहे थे तब तुम्हारी इन्साफ पसंदी कहाँ थी ? हिन्दुओं के छः हजार से अधिक मंदिर तोड़े गए और मुसलमानों की तरफ से इन्साफ पसंदी की तब से अब तक एक भी आवाज नहीं फूटी ....देश में एक मात्र जम्मू -कश्मीर वह राज्य है जो सदैव मुसलमान शासित रहता है वहां गुजरे एक दशक में 200 से अधिक मंदिर तोड़ दिए गए पर जब हिन्दुओं के मंदिर तोड़े जाते हैं तो मुसलमानों की तरफ से शातिराना चुप्पी है .अगर पूजाघर /इबादतगाह तोड़ना गलत है तो जो गलती औरंगजेब के जमाने से आज तक मुसलमान जारी किये हुए हैं और शातिराना चुप्पी साधे हैं वही काम जब एक बार हिन्दुओं ने बाबरी मस्जिद पर कर दिया तो वह गुनाह है और बीस साल से छाती पीट रहे हैं, ---क्या यह न्याय संगत है ? दूसरे, सभी जानते हैं कि मोबीन से लेकर सूफियान की राज सत्ता के रहते मुहम्मद साहब कभी मक्का में प्रवेश ही नहीं कर सके और अपने आख़िरी दौर में उन्होंने अपनी प्राण रक्षा के लिए भारत में शरण ली थी जहाँ उन्होंने जम्मू-कश्मीर जा कर अखरोट की लकड़ी से भव्य मस्जिद बनाई . चूंकि वह मुक़द्दस मस्जिद स्वयं मुहम्मद साहब ने बनाई थी अतः मुसलमानों के एक तीर्थ की तरह वह चरार-ए-शरीफ नामक मस्जिद जानी जाने लगी . जिसे उसी कालखंड में एक मुसलमान आतंकी मस्तगुल ने जला कर राख कर दिया कि जिस कालखंड में बाबरी मस्जिद ढहाई गयी . यानी बात साफ़ है कि चरार -ए -शरीफ जैसी स्वयं मुहम्मद साहब की बनाई मस्जिद को अगर कोई पाकिस्तानी मुसलमान जला कर राख कर दे तो कोई बात नहीं ...देश में मुहम्मद साहब की आख़िरी निशानी नहीं रही तो कोई बात नहीं पर बाबरी मस्जिद पर छाती पीटना नहीं भूलेंगे .राम और कृष्ण दोनों की जन्म स्थली पर मुग़ल आक्रमणकारीयों ने मस्जिद बनाई . मुहम्मद साहब की बनाई मस्जिद चरार -ए -शरीफ का कोइ दर्द नहीं ? जम्मू-कश्मीर आज़ादी से अब तक मुसलमान शासित राज्य है वहां हिन्दू कितना सुरक्षित है यह कभी सोचा है उन कट्टरपंथी मुसलमानों ने जहां से लाखों कश्मीरी पंडित दो दशकों से पलायन कर रहे हैं ? जम्मू-कश्मीर में हिन्दुओं को अपने तीर्थ अमरनाथ यात्रा करने पर हर साल क़त्ल -ए -आम का शिकार होना पड़ रहा है क्या यह जम्मू -कश्मीर का नज़ारा इन कानी आँख से सेक्यूलर सत्य देखते लोगों को दिखाई नहीं देता ? यह लोग जम्मू-कश्मीर नहीं देखते पर गुजरात देखते हैं  ...वही गुजरात जहां महाराष्ट्र से पलायन करके शाहीन और उसका परिवार जा बसा है और महफूज़ महसूस कर रहा है ...गुजरात के दंगों की तो सुनियोजित शातिराना शैली में बातें करेंगे पर क्या यह बताएँगे कि गुजरात के दंगे क्यों शुरू हुए ? गोधरा में हिन्दू तीर्थ यात्रियों से भरी ट्रेन जला कर तीर्थ यात्रियों को ज़िंदा जला डालने का गुनाह और उस पर अब तक की शातिराना चुप्पी साम्प्रदायिकता को कानी आँख से देखना ही है,--- इससे बाज आयें ...अब बहुत हो चुका ...शान्ति से रहने की कोशिश करें एक -दूसरे के जख्म न कुरेदें ...हिन्दू भी शौर्य दिवस मनाने से बाज आयें क्योंकि  अगर अपनी सरकार में बाबरी मस्जिद ढहा देना शौर्य था तो औरंगजेब तुमसे बड़ा सूरमा था जिसने अपनी सरकार में 6000 से अधिक मंदिर ढहाए ...फारुख अब्दुला /शेख अब्दुला भी 200 से अधिक मंदिर ढहा कर शौर्य से सरकार चला रहे हैं और मस्त गुल ने भी चरार -ए -शरीफ जला कर राख कर दी थी क्या वह "शौर्य" था या शातिर की करतूत ? लाखों हिन्दू लोग अमन और वतन के लिए बाबरी मस्जिद के मुद्दे पर मुसलमानों के जज्वात के साथ हैं पर गोधरा काण्ड की निंदा करती एक आवाज़ भी मुसलमानों के मुँह से आज तक नहीं फूटी क्यों ? जम्मू-कश्मीर में 200 से अधिक मंदिर तोड़े जाने पर अभी तक देश में क्या है कोई अमन पसंद मुसलमान है जो बोले ? साम्प्रदायिकता को कानी आँख से देखने की कवायद न करें ." -----राजीव चतुर्वेदी




Tuesday, December 4, 2012

आओ हम दुःख की रजाई ओढ़ कर सो जाएँ धीरे से

"आओ हम दुःख की रजाई ओढ़ कर सो जाएँ धीरे से
और मैं तुमसे ये पूछूं -- " खुश तो हो ? "
सर्द हैं आहें,    हवाएं खौफ से खामोश हैं
सहमे से मकानों की टूटी खिड़कियों से आती चांदनी चर्चा करेगी
हरारत की इबारत दर्ज हो जब सांस में तेरी
जरूरत का जनाजा सुबह सपने ओढ़ कर
उस चौखट को जब लांघेगा जहाँ दरवाजे अब गुमशुदा हैं
सहम के पूछती है रात -- "सफ़र लंबा है तेरा ?"
आओ हम दुःख की रजाई ओढ़ कर सो जाएँ धीरे से
और मैं तुमसे ये पूछूं खुश तो हो ?"     ---- राजीव चतुर्वेदी

पैसे के आते ही भाषाएँ बदल जाती हैं रातों-रात

"मेरी चीख
तुम नहीं सुनोगे
अब तुम तक नहीं पहुंचेगी मेरी कोई आवाज़
पैसे के आते ही भाषाएँ बदल जाती हैं रातों-रात
मैं वही हूँ
बदला नहीं हूँ
तुम्हारी गुड मोर्निंग के जवाब में कहूंगा शुभ प्रभात .
"                  ---- राजीव चतुर्वेदी

लोकतंत्र के इस पड़ाव पर

"आज प्रभावों से पस्त
और अभावों से ग्रस्त एक बस्ती में
दो औरतें नल के पानी की चाहत में
नितांत संसदीय भाषा में संसद -संसद खेल रही थी
न नल में पानी था न सरकार की आँख में पानी था
राशन भाषण अनुशासन के अनुच्छेद आकार ले रहे
शब्दकोष में गाली थी जो
मतभेदों की मतवाली भाषा अब मदान्ध महसूस हो रही
ऐसे त्रासद दौर में जीती मतदाताओं की पूरी पीढी
मूलभूत आवश्यकता की चाहत में घोर यंत्रणा झेल रही थी

एक तरफ राशन के रस्ते
और वहां भाषण गुलदस्ते
जनता को विश्वास बहुत था
वोट वहां मिलते थे सस्ते
नेताओं की दूसरी पीढी जनता के विश्वास से देखो खेल रही है
जनता का बेटा जनता है
नेता का बेटा नेता है
जन्मजात जनतंत्र सीखती
घोटाले का मन्त्र सीखती
गुंडों का अंब तंत्र सीखती
शातिर सी मंशा लेकर भी सभ्य दीखती
सत्ता की सीढ़ी पर चढ़ती नेताओं की नाकाबिल पीढी
लोकतंत्र के इस पड़ाव पर
जनादेश का नया खिलोना खेल रही है ."
---- राजीव चतुर्वेदी

Monday, December 3, 2012

भारत में वैश्या वृत्ति भी है और प्रवृत्ति भी

" भारत में वैश्या वृत्ति भी है और प्रवृत्ति भी यहाँ दो प्रकार का देह व्यापार हो रहा है एक तो दहेज़ के नाम पर देह व्यापार जिसमें पुरुष वेश्याएं अपनी देह बेच रही हैं और दूसरे प्रकार का देह व्यापार कि जिसमें नारी देह सामान की तरह खरीदने का अपमान है। पहले पुरुष वेश्याओं की बात हैं .---- दहेज़ निश्चय ही "देह व्यापार " है और दहेज़ ले कर शादी करनेवाले दूल्हे / पति "पुरुष वैश्या". दहेज़ वैश्यावृत्ति है और दहेज़ की शादी से उत्पन्न संताने वैश्या संतति. याद रहे वैश्या की संताने कभी क्रांति नहीं करती तबले सारंगी ही बजाती हैं .लेकिन ताली दोनों हाथ से बज रही है. जब तक सपनो के राजकुमार कार पर आएंगे पैदल या साइकिल पर नहीं तब तक दहेज़ विनिमय होगा ही . जबतक लड़कीवाले लड़के के बाप के बंगले कार पर नज़र रखेंगे तब तक लड़केवाले भी लड़कीवालों के धन पर नज़र डालेगे ही. इस तरह की वैश्यावृत्ति से आक्रान्त समाज में अब लडकीयाँ अपने थके हुए माँ -बाप की गाढ़ी कमाई पुरुष देह को अपने लिए खरीदने के लिए खर्च करने को मौन /मुखर स्वीकृति देती हैं ...यदि स्वीकृति नहीं भी हो तो विरोध तो नहीं ही करती हैं। लडकीयाँ दहेज़ से लड़ना ही नहीं चाह रहीं। सुविधा की चाह उन्हें संघर्ष की राह से बहुत दूर ले आई है। देश में दूसरे तरह का देह व्यापार स्त्री देह व्यापार है। जिस देश में साल में दो बार नौ -नौ दिन नौ देवी जैसे पर्व मनाये जाते हों ...अस्य नार्यन्ती पूज्यन्ते जैसे जुमले गुनगुनाये जाते हों गार्गी, सीता, यशोदा, अन्नपूर्णा, सरस्वती के संस्कारों की विराशत के देश में आज भी विश्व के सबसे बड़े देह व्यापार के बाजार हैं वह भी वहां जहां दुर्गा पूजा की दीवानगी है यानी कलकत्ता जी हाँ में कोलकाता के सोना गाछी और बहू बाज़ार नामक रेड लाईट एरिया की बात कर रहा हूँ। विडंबना यह कि मानवाधिकार के लिए छाती पीटने के आदी वामपंथी यहाँ तीस साल राज्य कर के गुजर गए और अब एक महिला ममता का राज्य है। क्या आपको पता है कि विश्व की हर सातवीं बाल वैश्या भारत की बेटी है। देश में सुबोध लडकीयाँ मुम्बई -दिल्ली जैसे शहरों में खुलेआम आपने आपको विभिन्न बहानो और आवरणों में बेच रही हैं और अबोध गरीब लडकीयाँ खुले-आम खरीदी-बेची जा रही हैं। कभी अरबी शेख से शादी के नाम पर कभी शादी के नाम पर और अक्सर "गायब हो गयी" के नाम पर लडकीयाँ देह बाज़ार में भेजी जा रही हैं। फिल्म "तलाश" में करीना का एक संवाद है----" वेश्यावृति अपराध है साहब हमरे देश में, जो अपराध करता है वो खुद अपनी गिनती कैसे करवाए? और जिसकी गिनती नहीं वो अपने गायब होने की रिपोर्ट कैसे कराये? हजारो लडकिया ऐसे ही गायब हो जाती है साहब और किसी को कोई फर्क नहीं पड़ता।" कुल मिला कर भारत में सामाजिक संस्तुति से होता पुरुष वेश्याओं का देह व्यापार यानी "दहेज़" और स्त्री वेश्याओं की बढ़ती संख्या इस राष्ट्र को कलंक की कगार पर ले आये हैं। ऐसे में क्रान्ति की संभावना कोई नहीं क्योंकि याद रहे --वैश्या संताने क्रांति नहीं करती,...नाच बलिये करते हैं तबले-सारंगी ही बजाते हैं।"-- राजीव चतुर्वेदी

आम आदमी को "आम" की तरह ख़ास आदमी चूसता रहा है


"आम आदमी को "आम" की तरह ख़ास आदमी चूसता रहा है ...मुग़ल कालीन जुमला है "कत्ले आम" यानी यहाँ भी आम आदमी का ही क़त्ल होता था ...अंग्रेजों के समय भी आम आदमी ही गुलाम था ...नेहरू से मनमोहन तक भी आम आदमी की खैर नहीं रही ...रोबर्ट्स बढेरा को भी बनाना रिपब्लिक घोटाले की डकार लेते हुए मेंगो रिपब्लिक लगने लगा कार्टून की दुनिया में आर के लक्ष्मण के "आम आदमी" की हैसियत काक के कार्टूनों में भी नहीं बदली ...आम आदमी पर वामपंथी कविता सुनते ख़ास आदमी ने भी द्वंदात्मक भौतिकवाद दनादन बघारा ...आम आदमी की चिंता में संसद के ख़ास आदमी अक्सर खाँसते हैं ...अब केजरीवाल को भी आम आदमी को आम की तरह चूसना है ...अरे भाई आम आदमी वह है जिसे केरोसीन के तेल का मोल पता हो ...राशन की दूकान की कतार में कातर सा खडा हो ...आलू की कीमत से जो आहात होता हो ...जो बच्चों के साथ खिलोनो की दूकान से कतरा कर निकलता हो ...जो बच्चों को समझाता हो कार बालों को डाईबिटीज़ हो जाती है क्योंकि वह पैदल नहीं चलते ...आम आदमी अंगरेजी नहीं बोलता ...आम आदमी के बच्चे मुनिस्पिल स्कूल में पढ़ते है। वहां टाट -पट्टी पर बैठ कर इमला लिखते हैं ...वह जब कभी रोडवेज़ बस से चलता है ...उसका इनकम टेक्स से उसका कोई वास्ता नहीं होता किन्तु वह इनकम टेक्स अधिकारी से भी उतना ही डरता है जितना और सभी घूसखोर अधिकारियों से डरता है क्योंकि घूस देने पर उसके सपनो का एक कोना तो टूट ही जाता है ...आम आदमी देश की मिट्टी से जुडा होता है वह खेत की मिट्टी देख कर बता देता है कि यह बलुअर है या दोमट ...आम आदमी मिट्टी देख कर बता देता है इस मिट्टी में कौन सी फसल होगी बिलकुल वैसे ही जैसे कोई केजरीवाल बताता हो इस मिट्टी में कौन सा वोट उगेगा ?" --- राजीव चतुर्वेदी






" वह कभी मुनिस्पिल स्कूल या गाँव के टाट -पट्टी वाले स्कूल में नहीं पढ़े थे ... उनके घर की औरतों ने सार्वजनिक नल से लाइन में लग कर पानी भी नहीं भरा था ...गाँव के कुए से भी पानी नहीं भरा था ...उनके घर की औरतें कभी खुले में शौच नहीं गयीं ... आलू -प्याज , रसोई गैस की कीमत उनके भोजन की प्रवृति को प्रभावित नहीं करती थी ... उन्होंने राशन कार्ड से लाइन में लग कर कभी मिट्टी का तेल नहीं खरीदा ...उन्होंने चाय की गुमटी पर जा कर कभी दैनिक अखबार भी नहीं पढ़ा ...उनके घर की बिजली /पानी बिल जमा न कर सकने के कारण कभी नहीं काटी गयी ...उनके बच्चे को कभी स्कूल में फीस न जमा कर पाने के कारण अपमानित किया गया ...उन्होंने कभी सरकारी अस्पताल में पर्चा कटवा कर इलाज नहीं करवाया ...उनके यहाँ बर्थ डे पार्टी पर लोग रिक्से से नहीं आते. ...अचानक ऐसे लोग आये ...उन्होंने कीमती कपडे सादगी से पहन रखे थे ...उनका चश्मा कीमती ,लेंस महगा ,सेन्स अभिजात्य और नज़रिया ही विदेशी नहीं था आय का जरिया भी विदेशी था और अधिकाँश NGO पोषित थे ... उनमें से कुछ मंहगी विदेशी जींस के ऊपर देसी कुर्ता पहने थे और अन्दर कीमती बनियाइन ...वह आपस में अंगरेजी और बाहर हिन्दी बोलते थे ... वह देश के सभी बलात्कारों पर चुप रहते थे पर दिल्ली के बलात्कार पर मसाल की जगह मोमबत्ती सुलगा लेते थे ... उन्होंने बड़ी चालाकी से आंदोलनों में घुस कर उसे मेला बना डाला और मुद्दे बेचने लगे ...कहा कि हम काला धन विदेशों से वापस लायेंगे ...भीड़ इकट्ठी हो गयी ...इस बीच निर्भया का आन्दोलन भीड़ की रीढ़ बना ...फिर उन्होंने बड़ी चालाकी से काले धन का मुद्दा दरकिनार किया और चिलाये 'जन लोकपाल ' ...पर जन लोकपाल के स्वाभाविक नेता तो अन्ना हजारे थे सो अन्ना का पन्ना भी पलट दिया अब वह चिल्लाने लगे देश की राजधानी में मुफ्त बिजली-पानी ...दिल्ली निशाने पर थी . मुफ्त की बिजली -पानी का चुगा खाने के लिए चिड़िया बहेलिये की दलिया में आ चुकी थी तो काला धन कौन याद करे , जन लोकपाल कौन याद करे , निर्भया से सरोकार कौन रखे ...वोट जनता का नोट फोर्ड फाउनडेशन का अभिजात्य लोग जुटने लगे ...अब आम आदमी का प्रवक्ता आम आदमी नहीं था इस परिवर्तन की लहर में आम आदमी का प्रवक्ता ख़ास आदमी था ...जब तक आम आदमी समझता उसकी जुबान भी तह करके ख़ास आदमी ने अपनी जेब में रख ली थी ...आम आदमी का आखेट हो चुका था ." ----- राजीव चतुर्वेदी