Monday, September 3, 2012

कऊओं की बस्ती में भी कोयल की कूक सवेरा करती है

"गूंगे लोगों से गुफ्तगू करते-करते थक गया हूँ मैं,
दीवारों से जब बात करो तो वह भी गूंजा करती है,
गद्दारों की पीढी सच के आगे रुकती है फिर सोचा करती है
इन आत्ममुग्ध लोगों में कविता क्या कहना ?
कऊओं की बस्ती में भी कोयल की कूक सवेरा करती है."

             ----राजीव चतुर्वेदी

Saturday, September 1, 2012

मेरी इच्छा चूल्हे की चिंगारी जैसी

"मेरी इच्छा चूल्हे की चिंगारी जैसी,
और ऊपर फूंस के छप्पर सी दुनिया."

----राजीव चतुर्वेदी 

Tuesday, August 28, 2012

बिखरे सपनो की किरचें घायल करती हैं

"बिखरे सपनो की किरचें घायल करती हैं,
शब्द खड़े हैं रस्तों में अब शातिर से
सहमा सा छाता अब व्याख्या करता है हर बादल की
पगडंडी के पाखंडी सच से गुजर रहे ग़मगीन समाजों के सच को भी देखो
तो बात करो बरसातों की
उसमें आंसू की बूँद तुम्हारी भी होगी." ----राजीव चतुर्वेदी

Friday, August 24, 2012

हम दरअसल अमेरिका के गुलाम हैं



"अगर यह लड़ाई लोकतंत्र की होती तो अच्छा था...अगर यह लड़ाई जनादेश की होती तो अच्छा था ...अगर यह लड़ाई कोंग्रेस -भाजपा--सपा-वाम--NDA-UPA की होती तब भी अच्छा था...यह लड़ाई हिन्दू -मुसलमान की भी नहीं है. यह लड़ाई तो KGB Vs. CIA है जिसमें जनादेश या हम भारतीय नागरिकों की इच्छा बेमानी है. हमारा प्रधानमंत्री चुनाव जीत कर नहीं आता बल्कि "मेड बाई अमेरिका" आता है. हमारे क़ानून "मेड बाई अमेरिका" आते हैं. हमारा राष्ट्रपति "मेड बाई अमेरिका" होता है. सोनियां इलाज करवाने जाती हैं तो अमेरिका. यह अमरीकी गुर्गे भारत की राजनीति में सेंध फोड़ कर घुस आये हैं चुनाव जीत कर हमारा जनादेश ले कर नहीं आये. एशिया में सोवियत रूस के वर्चस्व को मात देने के लिए अमेरिका ने ओसामा बिन लादेन को गोट बनाया था और भारत को मात देने के लिए मन मोहन सिंह को गोट बनाया है. मन मोहन सिंह भारतीय राजनीति के टेस्ट ट्यूब बेबी होते तो स्वीकार कर लिए जाते...वह भारतीय राजनीतिक पालने मैं पल रही लोकतंत्र की नाजायज संतान हैं. यह अमरीकी वायरस भारतीय राजनीति में जब से घुसे है भारत की राजनीति वायरल फीबर से ग्रस्त है. चूंकि मन मोहन सिंह जनता से सीधे चुन कर तो आये नहीं हैं इस लिए जनता के प्रति जवाबदेह भी नहीं हैं वह अमेरिका के द्वारा भारत पर थोपे गए हैं इस लिए अमेरिका के प्रति जवाब देह हैं और आज की तारीख में हम दरअसल अमेरिका के गुलाम हैं." ----राजीव चतुर्वेदी

गैलीलियो और गुलेलों के बीच



"गैलीलियो और गुलेलों के बीच सभ्यता के शिलान्यासों को भी देख,
आसमानों और धरती के बीच असमान से अहसासों को भी देख
एक सूरज सहम कर शाम को बिजली के खम्बे में लटक कर आत्महत्या कर चुका है
दूसरी सभ्यता ऐसी है कि उसकी रात ही गुलजार होती है
एक अभागन माँ,   बेटी की विवशता जानती है और रो-रो के सोती है
जानती है सुबह तक बेटी लौटेगी अपनी देह के अनुपात में कुछ दाम लेकर चेहरा दामन से लपेटे
चांदनी के चरित्रों का चर्चा सुन के सूरज सिहर जाएगा
एक सूरज सहम कर शाम को बिजली के खम्बे में लटक कर आत्महत्या कर चुका होगा आसमानों और धरती के बीच असमान से अहसासों को भी देख  
गैलीलियो और गुलेलों के बीच सभ्यता के शिलान्यासों को भी देख."  ----- राजीव चतुर्वेदी 



Tuesday, August 21, 2012

ज़रा हाथ दिखाओ, --- कहीं खंजर तो नहीं ?

"तेरी मुस्कराहट मेरी नज़रों का धोखा भी तो हो सकती है,
ज़रा हाथ दिखाओ, --- कहीं खंजर तो नहीं ?
हर बार किसी घर से निकाला है मेरे अपनों ने,
सोचता हूँ बारहा फिर वही मंजर तो नहीं ?
मैंने तो रिश्ते के पौधे भी लगाए थे यही सोच कर
इन दरख्तों के साए में कुछ अपने भी यहाँ बैठेंगे
प्यार के पौधे दरख़्त बनने से पहले ही यहाँ सूख गए ,
हौसले अब हाँफते हैं, सोचता हूँ, ---कहीं तेरे जहन की जमीन ही बंजर तो नहीं ? "
----राजीव चतुर्वेदी 

Sunday, August 19, 2012

ईद को कैसे कहूं मैं अब मुबारक ?



"ईद को कैसे कहूं मैं अब मुबारक ?
खून जो फैला है सड़क पर वह भी तो मेरा ही है
जिस वतन में हो रहा है यह रमजान की रस्मों की तरह
उस देश का गुनाह है यह महज़
कि हज़रत मुहम्मद महफूज थे इस देश में उस दौर में जब यजीदी कारवाँ कोहराम करता था 

फातिमा के आंसुओं में अक्स है इंसानियत का
सूफियानो की यहाँ औलाद सुन लें और सोचें
कातिलों की यह कतारें कर रही अब अलविदा हैं
अलविदा नावाजों को...मुहम्मद के नवासों को ...अमन की हर रिवाजों को
और यह भी तो बताओ तुम हमें
होली और दीपावली की बधाई तुम कभी भी क्यों नहीं देते ?
और जब हमने आदाब कह कर अदब तुमको दिया
"जय राम जी की"... तुम्हारी जुबान से भी क्यों नहीं फूटा ?
यह माना कि तुम बन्दे हो खुदा के पर कभी बन्दे मातरम क्यों नहीं कहते ?
खौफ खाओ खुदा का, सूफियानो के न तुम वारिस बनो
जो मरे हैं माँ तो उनकी फातिमा भी है
जिन्दगी की इस कर्बला में तुम किधर हो ?
सूफियों के इस वतन में सूफियानो के सिपाही या यजीदी काफिले यह ?
ईद की कैसे कहूं मैं अब मुबारक ?
ईद की किसको कहूं मैं अब मुबारक ?
फातिमा मेरी थी तो सीता उसके पहले तेरी थी यह याद रख
इस धरा पर "गोधरा" तैने किया कह दे याजीदों से
तेरे पुरखे यहीं इस देश के ही थे, यहाँ के ख्वाब तेरे हैं, यहाँ की ख़ाक तेरी है
तू चूम ले इस देश की धरती को,--- यही है फ़र्ज़ अब तेरा
तुम कहो एक बार बन्दे मातरम मैं कहूंगा ईद तुमको हो मुबारक !!
" -----राजीव चतुर्वेदी