Friday, June 22, 2012

इस दौर में हर रोशनी बिकती है

"मैं जानता हूँ इन उदास रातों का उल्लेख अखबारों में नहीं होगा
शब्द चीखेंगे नहीं सुबकेंगे तो
सुबह फिर से ढाढस बंधाती दौड़ आयेगी
जिन्दगी का ठहरा पहिया चरमरा कर चल पड़ेगा
तुम मिलोगे राह में फिरसे गुज़रते वक्त से
निरंतर बढ़ रही इन दूरियों के दरमियाँ मैं देखूंगा तुम्हें मुड मुड़ के
खो रही इस जिन्दगी के सो रहे सपने जगाता
बिक चुका हूँ मैं
जो नहीं बिक पाया इस दुकाँ से उस मकां तक वह तुम्हारा शेषफल हूँ
तारीकियाँ तश्दीक करती हैं कि
चुका पाए नहीं हो तुम गुज़रे माह का बिजली का बिल
और यह भी कि इस दौर में हर रोशनी बिकती है." ----राजीव चतुर्वेदी    

Thursday, June 21, 2012

इस गाँव में अहसास के छप्पर तो बहुत पुराने हैं

"इस गाँव में अहसास के छप्पर तो बहुत पुराने हैं,
पर उस बूढ़ी गाय को कसाई को किसने बेचा ?
खेत अपने थे, खलिहान अपने, आढतें दूसरों की
यह अजीब दौर था जब कीमतें बढ़ती थी ऊसरों की
यह सच है भूख थी और फसल थी फासले पर,
जो शातिर लोग संसद में हैं उनको वोट किसने बेचा ?"
----राजीव चतुर्वेदी

जब भी तुम गुजरोगे वहां से एक झोंके से हवा के



"आसमान जब अपनी बुलंदियों पर इतरा रहा होगा
जमीं भी जब कभी जमीनी हकीकत से रूबरू होगी
मैं दसमलव सा दरमियां की दूरियों के बीच दरख्तों सा खडा
अस्तित्व की अंगड़ाईयों के हर नए आकार को जब उपलब्धियों का नाम दूंगा
जब भी तुम गुजरोगे वहां से एक झोंके से हवा के
मुस्कुरा कर माफ़ कर दोगे मुझे."
                                          -----राजीव चतुर्वेदी

Monday, June 18, 2012

इस बरसात में भावनाओं का भू स्खलन हो रहा है

"इस बरसात में भावनाओं का भू स्खलन हो रहा है,
जिन्दगी के रास्तों पर जो मलवा गिरा है
उन्ही को लांघ कर मैंने सफ़र पूरा किया
जिन्दगी में खरासों की ख्वाहिश कौन करता है ?
तलासे थे जो मकसद मैंने खो दिए है
आँख के सपने कभी के रो दिए हैं
चरागों की रौशनी अब रौशनाई बन तारीकियों की तस्दीक करती है
माना मैं पत्थर था, तराशा तूने था
पर सच ये है कि मेरा जिस्म जिसने तोड़ा वह हथौड़ा तू ही था
अब रोक न मुझको मुझे जाना है बहुत दूर तुझसे
ख्वाहिसों में खामियां थीं ...इतनी तो न थीं कि खलिश खोजती घूमे खला में मुझको
जिन्दगी में खरासों की ख्वाहिश कौन करता है ?
तलासे थे जो मकसद मैंने खो दिए है
आँख के सपने कभी के रो दिए हैं
चरागों की रौशनी अब रौशनाई बन तारीकियों की तस्दीक करती है
इस बरसात में भावनाओं का भू स्खलन हो रहा है,
जिन्दगी के रास्तों पर जो मलवा गिरा है
उन्ही को लांघ कर मैंने सफ़र पूरा किया." -----राजीव चतुर्वेदी

जब तलक आँख में उनके पानी था मैं पी लेता था

"शाकी, पैमाने ,मैखाने रिंद और जाम न रहे,
मुगलिया सल्तनत ढह गयी और वैसे आवाम न रहे.
जब तलक आँख में उनके पानी था मैं पी लेता था,
अब उनकी आँखों में पानी भी न रहा, ओस में नहाने वाले भी न रहे." -----राजीव चतुर्वेदी  

Wednesday, June 6, 2012

संकेतों से सहमी दुनिया, शब्दों को कैसे पढ़ पाती ?

"संकेतों से सहमी दुनिया, शब्दों को कैसे पढ़ पाती ?
  आभाशों के अहसासों से परिभाषा कैसे गढ़ पाती ?
पत्नी को भी हार गया वह अधम जुआरी धर्मराज क्यों कहलाया ?
जो जीता वही सुयोधन था फिर दुर्योधन क्यों कहलाया ?
बहनों की ससुरालों में हस्तक्षेप करने वाला खलनायक होता है
फिर कृष्ण कहाँ से नायक था और शकुनी क्यों खलनायक है ?
कानी आँखों के दर्शन और लंगडी परिभाषाएं युगों को नाप नहीं पायी हैं
इस सच को सह पाओ तो सहमत हो जाना
वरना चमचे चाटुकारिता का च्यवनप्राश तो चाट रहे हैं
तुम भी चाटो,... दीर्घायु हो,... पर यह भी जानो
चमचे जय जयकार किया करते हैं
चमत्कार क्या कर पायेंगे ?"------राजीव चतुर्वेदी

Saturday, June 2, 2012

शब्द सहमे थे बोलते तो बोलते कैसे ?

"मैं चुप हूँ
तुम भी बोलते क्यों नहीं ?
आओ इस सन्नाटे को जख्मी करें." ----राजीव चतुर्वेदी
"चीख कर चुप हो गया उनवान कविता का,
शब्द सहमे थे बोलते तो बोलते कैसे ?" ----राजीव चतुर्वेदी
"चराग की ही आग से छप्पर जला था गाँव का,
रो रही वह बस्तियां अब रोशनी से डरती हैं." ----राजीव चतुर्वेदी